भारत में बढ़ता वायु-प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों और दिल के लिए नहीं, बल्कि दिमाग के लिए भी एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित हालिया अध्ययन के अनुसार, हवा में PM2.5 के स्तर में सिर्फ एक माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर की बढ़ोतरी मानसिक बीमारियों के मामलों में तेज़ इजाफा करती है। इस मामूली बढ़ोतरी से हर एक लाख लोगों में डिप्रेशन के 9.6%, एंज़ाइटी के 5.3% और तनाव से जुड़ी परेशानियों के 2.6% नए मामले सामने आते हैं। सिर्फ बाहर की हवा ही नहीं, घर के अंदर की हवा भी बच्चों के दिमाग के लिए उतनी ही हानिकारक साबित हो रही है। यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया (UEA) के शोध में पाया गया कि भारत की इनडोर वायु गुणवत्ता दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को बाधित कर रही है। UEA के प्रमुख शोधकर्ता जॉन स्पेंसर के अनुसार, ग्रामीण भारत के घरों में PM2.5 की अधिकता से न सिर्फ बच्चों की सीखने-समझने की क्षमता घटती है, बल्कि भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं।